कुआनो का ‘कत्लेआम’: प्रशासनिक आदेशों को ठेंगा दिखा बेखौफ जारी मछली शिकार
प्रशासन का काम सिर्फ आदेश जारी करना नहीं, बल्कि उसका पालन सुनिश्चित करना भी है। यदि जिलाधिकारी का आदेश मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाए, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना लाजिमी है।
अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक सुस्ती का ‘जाल’: कुआनो नदी में सरेआम उड़ाए जा रहे नियम-कानून
- कुआनो में अवैध शिकार पर मौन क्यों प्रशासन? कब टूटेगी अधिकारियों की नींद?
- क्या जिला प्रशासन के आदेशों की कोई अहमियत है? मूड़घाट में जारी है नियमों की धज्जियाँ
- सरकारी प्रतिबंध बेअसर: क्या संरक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है?
बस्ती: मानसून की पहली फुहारों के साथ ही कुआनो नदी में मछलियों के जीवन को बचाने के लिए शासन ने 15 जून से 31 अगस्त तक का ‘प्रजनन काल’ घोषित किया है। जिलाधिकारी कृत्तिका ज्योत्सना का आदेश स्पष्ट है—नदी में मत्स्य आखेट पूर्णतः प्रतिबंधित है। उद्देश्य नेक है कि जल जैव विविधता बनी रहे और नदियों का पारिस्थितिक तंत्र समृद्ध हो। लेकिन, धरातल पर स्थिति कुछ और ही बयां कर रही है। शहर के मूड़घाट में कुआनो नदी के शांत जल को मछुआरों ने एक ऐसी ‘शिकारगाह’ में बदल दिया है, जहाँ प्रशासन के आदेश महज कागजों की शोभा बनकर रह गए हैं।
जब रक्षक ही बने मूकदर्शक
प्रतिबंध के बावजूद नदी में जाल बिछाना और ‘डगन’ जैसे साधनों का प्रयोग करना सीधे तौर पर जिला प्रशासन की लचर निगरानी का प्रमाण है। सवाल यह उठता है कि जब प्रशासन की नाक के नीचे, शहर के इतने प्रमुख घाट पर नियमों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है, तो दूरदराज के इलाकों में क्या होता होगा? क्या मत्स्य विभाग के अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सो रहे हैं? या फिर इस अवैध कारोबार को किसी अदृश्य संरक्षण का कवच प्राप्त है?
कागजी आदेश, बेअसर कार्रवाई
मछलियों का यह प्रजनन काल उनके वंश की वृद्धि के लिए अत्यंत संवेदनशील समय होता है। इस दौरान शिकार करना न केवल एक प्रशासनिक अपराध है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए नदी के संसाधनों को नष्ट करने का पाप भी है। मूड़घाट में हो रही यह गतिविधि इस बात की तस्दीक करती है कि प्रशासन की कार्यप्रणाली में ‘सख्ती’ का पूरी तरह अभाव है। यदि समय रहते प्रभावी गश्त और कार्रवाई सुनिश्चित की गई होती, तो किसी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वे प्रशासन को ठेंगा दिखा सकें।
जवाबदेही तय करने का समय
प्रशासन का काम सिर्फ आदेश जारी करना नहीं, बल्कि उसका पालन सुनिश्चित करना भी है। यदि जिलाधिकारी का आदेश मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाए, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना लाजिमी है।
अब समय आ गया है कि प्रशासन अपनी चुप्पी तोड़े और अवैध शिकारियों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करे। केवल जुर्माना लगाना काफी नहीं है, बल्कि जब्त किए गए जाल और अवैध उपकरणों को सार्वजनिक रूप से नष्ट कर एक कड़ा संदेश देने की जरूरत है। कुआनो नदी का अस्तित्व किसी के लालच का शिकार नहीं होना चाहिए। क्या जिला प्रशासन अपनी साख बचाने के लिए इस अवैध ‘जाल’ को उखाड़ फेंकने का साहस दिखाएगा? बस्ती की जनता जवाब की प्रतीक्षा में है।

















